
मान लीजिए एक लड़का 16 साल 8 महीने का है।
उस पर एक heinous offence का आरोप लगा।
घरवालों को जैसे ही पता चलता है, पहला सवाल आता है—
“अब इसका case Juvenile की तरह चलेगा या Adult की तरह?”
और यहीं से बहुत बड़ी गलतफहमी शुरू होती है।
कोई कहेगा—
“16 साल पार कर चुका है, अब adult मानो।”
दूसरा कहेगा—
“18 साल पूरे नहीं हुए, इसलिए हर हालत में juvenile ही रहेगा।”
लेकिन किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 ने इन दोनों के बीच एक बहुत specific legal रास्ता बनाया है।
16 से 18 वर्ष की उम्र में होना अपने-आप adult trial का ticket नहीं है।
और 18 से कम होना भी हर situation में यह guarantee नहीं देता कि मामला हमेशा उसी juvenile framework में आगे जाएगा।
अगर आरोप heinous offence का है, तो कानून पहले एक सवाल पूछता है—
क्या यह बच्चा उस alleged offence की nature और उसके consequences को समझने की क्षमता रखता था, और क्या उसके physical तथा mental capacity और घटना की circumstances को देखते हुए मामला आगे किस तरीके से चलना चाहिए?
यहीं से धारा 15, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 सामने आती है।
और ध्यान रखिए—यहाँ अभी trial शुरू नहीं हुआ है।
यह पहले यह तय करने वाली statutory stage है कि आगे का रास्ता क्या होगा।
16–18 साल वालों के लिए यह अलग व्यवस्था आखिर आई कहाँ से?
इस सवाल का जवाब समझे बिना आज का कानून थोड़ा अधूरा लगेगा।
Juvenile Justice Act, 2000 के समय भी मूल age framework 18 वर्ष से कम बच्चों के लिए था। उस कानून की constitutional validity को लेकर Supreme Court के सामने challenges आए। Salil Bali v. Union of India में Court ने 18 वर्ष की age classification को legislative policy के क्षेत्र में माना और intervention से इनकार किया। बाद में Subramanian Swamy v. Raju में भी juvenile classification को चुनौती दी गई, लेकिन Court ने यह क्षेत्र Parliament के legislative judgment के रूप में देखा।
फिर December 2012 में Nirbhaya case हुआ।
उस घटना में involved accused में से एक की उम्र लगभग 17½ वर्ष थी। इसके बाद यह national debate बहुत तेज हुई कि क्या 16–18 वर्ष के बच्चों द्वारा किए गए अत्यंत गंभीर offences के लिए existing juvenile framework पर्याप्त है। Supreme Court के बाद के judgments ने भी इस legislative history को record किया है।
लेकिन यहाँ एक जरूरी correction है।
यह कहना कि—
“Nirbhaya case हुआ और उसी के कारण सीधे 16–18 adult trial law बना।”
इतिहास को बहुत छोटा कर देना होगा।
असल में Parliament ने पुराने Juvenile Justice Act, 2000 को replace करके Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 बनाया। नए Act ने 16 वर्ष या उससे ऊपर के child के लिए, heinous offence के आरोप की स्थिति में, एक preliminary-assessment based pathway बनाया। यह नया Act 15 January 2016 से लागू हुआ।
यानी आज जो हम 16–18 वाले juvenile के adult-trial possibility की बात कर रहे हैं, उसका statutory आधार 2015 Act है—न कि पुराने 2000 Act का कोई automatic rule।
और यहीं से अगला सवाल बहुत स्वाभाविक है—
अगर 16 साल की उम्र पूरी होना अपने-आप adult trial नहीं बनाता, तो Board आखिर देखता क्या है?
Board की Preliminary Assessment के बाद क्या Juvenile सीधे Adult Trial में चला जाता है?
नहीं। यही इस पूरे process का सबसे महत्वपूर्ण अगला मोड़ है।
मान लीजिए Board ने Section 15 की preliminary assessment कर ली। अब सामने दो रास्ते हैं।
अगर Board को लगता है कि बच्चे के मामले को उसी Juvenile Justice Board के framework में आगे चलना चाहिए, तो मामला वहीं continue हो सकता है।
लेकिन अगर Board assessment के आधार पर यह राय बनाता है कि मामला adult trial की दिशा में जाना चाहिए, तब भी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।
यहाँ धारा 18(3), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 सामने आती है। Board अपने assessment के आधार पर मामला Children’s Court को भेज सकता है ताकि आगे की statutory process वहाँ हो सके।
अब जरा courtroom में इस स्थिति को रखिए।
JJB ने कहा—matter should go to Children’s Court.
तो क्या इसका मतलब—
“अब adult trial शुरू।”
नहीं।
Supreme Court ने इस distinction को बहुत गंभीरता से लिया है। 2024 के एक महत्वपूर्ण judgment में Court ने कहा कि Section 15 की preliminary assessment और Section 19 की Children’s Court inquiry को bypass करके सीधे adult trial शुरू नहीं किया जा सकता।
यानी Parliament ने यहाँ एक नहीं, बल्कि multiple legal safeguards बनाए हैं।
Children’s Court के सामने पहुँचने के बाद भी एक और कानूनी दरवाज़ा बचता है
अब मान लीजिए मामला Children’s Court तक पहुँच गया।
यहाँ बहुत लोग समझ लेते हैं कि अब Board का decision final था और Court को बस adult trial शुरू करना है।
यहीं एक और important legal check आता है।
धारा 19(1), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत Children’s Court को खुद भी यह देखना होता है कि बच्चे को adult के रूप में trial किया जाना चाहिए या नहीं।
अर्थात Board की preliminary assessment अंतिम judicial conclusion नहीं बन जाती।
Court को अपने स्तर पर statutory requirements देखनी होती हैं।
और यह कोई छोटी procedural formality नहीं है।
Supreme Court ने 2024 में साफ कहा कि Children’s Court Section 19 की mandatory inquiry को simply brush aside नहीं कर सकती। उसी judgment में Court ने पाया कि Section 15 की preliminary assessment और उसके बाद Section 18(3) का जरूरी order ही नहीं हुआ था; ऐसी स्थिति में trial court का adult trial आगे बढ़ाना legally impermissible था।
यानी courtroom में sequence कुछ ऐसा समझिए:
16+ child + heinous offence
↓
JJB की Section 15 assessment
↓
Board का statutory decision
↓
जरूरत होने पर Section 18(3) के तहत Children’s Court
↓
Children’s Court की Section 19 inquiry
↓
उसके बाद ही adult-trial pathway
यह sequence इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर अगला stage पिछले stage को automatically replace नहीं करता।
अगर Section 15 की Assessment ही नहीं हुई तो Adult Trial का क्या होगा?
अब एक ऐसा scenario सोचिए जहाँ accused की उम्र घटना के समय 16 से 18 के बीच थी और आरोप heinous offence का था।
लेकिन किसी वजह से मामला सीधे Children’s Court में चला गया।
Charge frame हो गए।
Trial भी आगे बढ़ गया।
फिर defence ने कहा—
“रुकिए। Section 15 की preliminary assessment तो हुई ही नहीं।”
अब यह कोई छोटी technical objection नहीं रह जाती।
Supreme Court ने 2024 में इसी तरह की स्थिति पर बहुत स्पष्ट फैसला दिया। Court ने कहा कि Section 15 की preliminary assessment और Board का Section 18(3) वाला order किए बिना Children’s Court के लिए adult trial शुरू करना permissible नहीं था। Court ने mandatory requirements के violation को गंभीर माना।
इसका मतलब यह है कि adult trial का रास्ता केवल offence की seriousness से नहीं बनता।
उसके लिए statutory procedure भी पूरा होना चाहिए।
और यही वह जगह है जहाँ किसी defence lawyer को केवल FIR और charge-sheet देखने के बजाय पूरा procedural record देखना पड़ सकता है।
क्योंकि कभी-कभी case का सबसे मजबूत legal question allegation के अंदर नहीं, बल्कि “कानून ने उस allegation को adult-trial stage तक पहुँचाया कैसे?” में छिपा हो सकता है।
क्या Psychologist की Report आते ही फैसला हो जाता है?
नहीं।
यह भी एक बहुत जरूरी distinction है।
Section 15 में Board को experienced psychologists, psycho-social workers या अन्य experts की assistance लेने की अनुमति है। लेकिन expert की report अपने-आप Board का final decision नहीं बन जाती।
Courtroom में इसे ऐसे समझिए।
Expert कहता है—
“मेरी assessment के अनुसार बच्चा consequences समझने की क्षमता रखता था।”
अब अगला सवाल होगा—
“Board ने बाकी statutory material को भी independently देखा या केवल उस report पर भरोसा कर लिया?”
यही फर्क expert opinion और judicial/statutory decision-making के बीच है।
2026 में इस area में judicial discussion और गहरा हुआ है। Courts ने Section 15 को mechanical exercise की तरह नहीं पढ़ा, बल्कि assessment में बच्चे की mental and physical capacity, consequences समझने की ability और offence की circumstances को statutory framework के अनुसार देखने पर जोर दिया है।
और इसलिए केवल यह कहना—
“Psychologist ने adult trial recommend कर दिया, इसलिए अब मामला adult court में जाएगा।”
कानून की पूरी प्रक्रिया नहीं बताता।
Recommendation एक material हो सकती है; statutory decision उसका अगला step है।
यहीं article का अगला और सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—
अगर Board ने adult trial recommend कर दिया, तो क्या Children’s Court उस recommendation को मानने के लिए बाध्य है?
क्या Children’s Court, Board की राय को मानने के लिए बाध्य है?
यहीं से मामला और दिलचस्प हो जाता है।
मान लीजिए Juvenile Justice Board ने Section 15 की preliminary assessment के बाद मामला Children’s Court को भेज दिया। अब अगर कोई यह मान ले कि—
“Board ने adult trial की तरफ भेज दिया, तो अब adult trial होना तय है।”
तो वह फिर एक जरूरी statutory safeguard छोड़ देगा।
धारा 19, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 Children’s Court को अपनी स्वतंत्र भूमिका देती है। Court को यह देखना होता है कि बच्चे का trial adult के रूप में होना चाहिए या नहीं। अगर Court को लगता है कि बच्चे को adult की तरह trial करने की आवश्यकता नहीं है, तो वह matter को Board को वापस भेज सकती है और फिर बच्चे के लिए Act के अनुसार आगे की प्रक्रिया चलती है।
यानी यहाँ एक बहुत साफ distinction है—
JJB का assessment → रास्ता खोल सकता है।
लेकिन
Children’s Court → अपने statutory decision के बिना adult trial को automatic नहीं बना देती।
और यही वह safeguard है जिसे किसी भी ऐसे मामले में सबसे पहले check करना चाहिए।
Adult Trial का रास्ता खुलने के बाद भी Juvenile Justice Act पूरी तरह पीछे नहीं हटता
अब मान लीजिए Children’s Court ने यह तय कर दिया कि बच्चे का trial adult के रूप में किया जाना चाहिए।
क्या इसका मतलब यह है कि अब बच्चे के साथ हर चीज बिल्कुल उसी तरह होगी जैसे किसी adult accused के साथ होती है?
यह निष्कर्ष भी जल्दबाजी होगा।
क्योंकि धारा 21, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 कुछ महत्वपूर्ण सीमाएँ लगाती है। Act के अनुसार किसी child को death sentence नहीं दी जा सकती और release की possibility के बिना life imprisonment भी नहीं दी जा सकती।
इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ आती है।
Adult-trial pathway का अर्थ यह नहीं है कि Parliament ने बच्चे को हर protective principle से बाहर कर दिया।
बल्कि कानून ने एक विशेष category बनाई है जिसमें trial का तरीका अलग हो सकता है, लेकिन बच्चे से जुड़ी कुछ statutory protections फिर भी बनी रहती हैं।
यानी courtroom में सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा—
“Adult trial होगा या नहीं?”
एक बार वह stage पार हो जाए तो अगला सवाल होगा—
“उस adult-trial framework में भी JJ Act की कौन-कौन-सी सीमाएँ लागू रहेंगी?”
यही distinction इस कानून को सामान्य criminal procedure से अलग बनाती है।
अगर Court Adult Trial का फैसला कर दे, तो क्या Juvenile की सारी पहचान खत्म हो जाती है?
नहीं।
यहाँ फिर एक बहुत आम misconception सामने आती है।
Adult manner में trial और व्यक्ति को हर कानूनी उद्देश्य से adult मान लेना एक ही बात नहीं हैं।
जिस समय alleged offence हुआ, उस समय उसकी age क्या थी—यह प्रश्न अपनी जगह महत्वपूर्ण रहता है।
इसीलिए JJ Act ने 16–18 आयु वर्ग के लिए एक special mechanism बनाया है।
अगर offence के समय व्यक्ति child था, तो केवल इसलिए कि बाद की proceeding किसी stage पर Children’s Court तक पहुँच गई, यह नहीं माना जा सकता कि वह उस घटना के समय से ही सामान्य adult accused था।
Supreme Court ने भी juvenile justice framework को पढ़ते समय date of occurrence और उस समय की age को महत्वपूर्ण माना है।
यही कारण है कि ऐसे मामले में record निकालते समय केवल आज की उम्र देखकर निष्कर्ष निकालना खतरनाक हो सकता है।
Courtroom में सही सवाल होगा—
“घटना की तारीख क्या थी और उस तारीख को आरोपी की legally determined age क्या थी?”
फिर उसके बाद ही Section 15, Section 18 और Section 19 की chain को पढ़ना meaningful बनता है।
16 से 18 वर्ष की उम्र में हर गंभीर मामला Adult Trial तक नहीं पहुँचता
अब इस article की सबसे जरूरी गलतफहमी को यहीं खत्म कर देना चाहिए।
16 वर्ष की उम्र पूरी होना अपने-आप adult trial नहीं बनाता।
18 वर्ष से कम होना भी अपने-आप यह guarantee नहीं देता कि हर situation में Board ही अंतिम forum रहेगा।
बीच में statutory conditions हैं।
सबसे पहले offence की category देखनी होगी—यहाँ Section 15 का mechanism heinous offences के लिए है।
फिर child की relevant age।
फिर preliminary assessment।
फिर Board का statutory order।
फिर, जहाँ applicable हो, Children’s Court की Section 19 वाली consideration।
और तभी यह तय होगा कि adult manner में trial का रास्ता वास्तव में खुलता है या नहीं।
इसलिए अगर किसी family को केवल इतना बताया गया है—
“बच्चा 16 से ऊपर है, इसलिए अब adult court में case चलेगा।”
तो उन्हें यहीं रुककर पूछना चाहिए—
“Section 15 की assessment हुई?”
“Board ने क्या order दिया?”
“Section 19 के तहत Children’s Court ने क्या decide किया?”
क्योंकि इन सवालों के जवाब के बिना केवल age देखकर पूरा legal picture तैयार नहीं होता।
एक वास्तविक Courtroom Situation: गलती कहाँ पकड़ी जा सकती है?
मान लीजिए पूरा मामला adult trial तक पहुँच चुका है।
लेकिन defence lawyer record पलटते हुए देखता है—
Section 15 की preliminary assessment का proper order नहीं है।
या फिर Board ने assessment की, लेकिन statutory requirements को record पर properly address नहीं किया।
या Children’s Court ने Board की recommendation को final मान लिया, लेकिन Section 19 की अपनी statutory consideration नहीं की।
अब defence के पास केवल आरोपों पर बहस करने का रास्ता नहीं है।
वह यह भी पूछ सकता है—
“क्या जिस stage पर यह case पहुँचा है, वहाँ पहुँचने के लिए कानून ने जो mandatory safeguards बनाए थे, वे वास्तव में follow हुए थे?”
यही वह procedural loop है जिसे सामान्य reader अक्सर देख ही नहीं पाता।
और Supreme Court ने भी ऐसे मामलों में procedural compliance को हल्के में नहीं लिया है। Court ने यह स्पष्ट किया है कि Section 15 और उसके बाद की statutory process को bypass करके सीधे adult trial में जाना कानून के अनुरूप नहीं है।
यानी कभी-कभी मामला केवल “बच्चे ने क्या किया?” पर नहीं टिकता।
एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है—
“कानून ने उस बच्चे के मामले को adult trial तक पहुँचाने के लिए जो रास्ता बनाया था, क्या वह रास्ता वास्तव में पूरा चला?”
तो 16 से 18 साल के Juvenile के मामले में पूरा रास्ता आखिर क्या है?
अब तक की सारी कड़ियाँ जोड़ें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है।
घटना के समय बच्चा 16 वर्ष या उससे अधिक, लेकिन 18 वर्ष से कम है। उस पर heinous offence का आरोप है।
यहीं से कानून एकदम सीधा adult trial शुरू नहीं करता।
पहले धारा 15, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत preliminary assessment का stage आता है।
फिर Board के assessment के आधार पर, जहाँ कानून की conditions पूरी होती हैं, धारा 18(3), उसी अधिनियम के तहत matter Children’s Court तक जा सकता है।
फिर धारा 19, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 Children’s Court की भूमिका सामने लाती है।
और यहीं एक बहुत जरूरी बात सामने आती है—
Board से Children’s Court तक पहुँचना और adult trial का final decision होना एक ही घटना नहीं है।
अगर कोई lawyer केवल इतना कहकर मामला खत्म कर दे कि—
“बच्चा 16 से ऊपर है और offence heinous है, इसलिए adult trial होगा।”
तो वह statutory journey का सबसे जरूरी हिस्सा छोड़ रहा है।
कानून ने बीच में safeguards इसलिए रखे हैं ताकि उम्र के साथ-साथ बच्चे की क्षमता और परिस्थितियों को भी देखा जा सके।
और यही पूरे कानून की balancing है
एक तरफ Parliament ने 16–18 आयु वर्ग में heinous offence के लिए अलग pathway बनाया।
दूसरी तरफ उसने यह भी नहीं कहा कि उस उम्र का हर बच्चा automatically adult है।
यानी कानून ने age को entry point बनाया है, final conclusion नहीं।
और Supreme Court के judgments ने इसी distinction को बार-बार महत्व दिया है। Barun Chandra Thakur v. Master Bholu में Court ने Section 15 की preliminary assessment को गंभीर statutory exercise माना और यह स्पष्ट किया कि इसे केवल एक formal exercise की तरह नहीं किया जा सकता। बाद के मामलों में Court ने यह भी देखा कि Section 15 और Section 19 की प्रक्रिया को bypass करने से adult trial की validity पर असर पड़ सकता है।
इसलिए किसी वास्तविक case में file खोलते ही मेरा पहला सवाल यह नहीं होगा कि—
“अपराध कितना serious है?”
पहला सवाल होगा—
“घटना के दिन उसकी उम्र क्या थी और Section 15 से Section 19 तक कानून ने जो रास्ता बनाया है, उसमें वास्तव में क्या-क्या हुआ?”
यहीं से सही legal analysis शुरू होता है।
इस कानून को समझने का सबसे आसान तरीका
इसे एक सीढ़ी की तरह समझिए।
16–18 की age अपने-आप आखिरी मंजिल नहीं है।
यह केवल वह point है जहाँ, heinous offence होने की स्थिति में, special statutory assessment शुरू हो सकती है।
उसके बाद—
Assessment → Board का decision → Children’s Court की statutory consideration → फिर applicable trial pathway
यही sequence है।
और अगर इस chain में कोई महत्वपूर्ण statutory step ही missing हो, तो बाद की proceeding पर उसका असर पड़ सकता है।
इसलिए किसी parent को अगर केवल इतना बताया जाए—
“आपका बच्चा 16 से ऊपर है, अब उसका case adult court में चलेगा।”
तो घबराने से पहले एक सवाल पूछिए—
“क्या Section 15 की preliminary assessment हुई है और उसका proper order record पर है?”
फिर अगला—
“Board ने Section 18(3) के तहत क्या किया?”
और उसके बाद—
“Children’s Court ने Section 19 के तहत अपनी statutory consideration की या नहीं?”
यही तीन सवाल कई बार पूरे मामले की दिशा समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
आखिर 16–18 वाले Juvenile के लिए यह व्यवस्था बनी ही क्यों?
इसका जवाब केवल Nirbhaya case में ढूँढना अधूरा होगा।
पुराने juvenile law में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए एक relatively uniform juvenile framework था। Supreme Court ने Salil Bali और Subramanian Swamy जैसे मामलों में Parliament की 18-year legislative policy को स्वीकार किया था।
फिर 2012 की भयावह घटना के बाद 16–18 age group के heinous offences को लेकर देश में तीखी बहस हुई।
Parliament ने Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 बनाया और उसमें 16–18 वर्ष के बच्चों के लिए एक अलग statutory mechanism रखा।
लेकिन Parliament ने फिर भी automatic adult trial नहीं बनाया।
उसने assessment रखी।
यही इस कानून की असली सोच है।
बच्चा 16 साल का है—इसलिए adult।
ऐसा नहीं।
बच्चा 16–18 के बीच है + alleged offence heinous है → अब कानून prescribed assessment और safeguards के माध्यम से तय करेगा कि आगे कौन-सा रास्ता अपनाया जाए।
यही distinction हमारे पूरे article का केंद्र है।
और अब आखिरी practical सवाल बचता है—
अगर ये सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद Children’s Court सचमुच adult trial का रास्ता चुन ले, तो उस बच्चे पर इसका वास्तविक कानूनी असर क्या होगा और कौन-सी protections फिर भी बनी रहेंगी?


