
सोचिए पुलिस के सामने एक लड़का खड़ा है।
वह कहता है—
“साहब, मेरी उम्र 17 साल है।”
पुलिस पूछती है—
“कोई proof है?”
लड़का Aadhaar निकाल देता है।
उसमें DOB ऐसी है कि वह नाबालिग दिख रहा है।
मामला यहीं खत्म हो जाना चाहिए था।
लेकिन investigation में एक और कागज सामने आता है।
School record में दूसरी DOB है।
अब पिता कहते हैं—
“साहब, school में admission के समय गलती से DOB गलत चली गई थी।”
Police के मन में सवाल उठता है—
“कौन-सी DOB सही है?”
और यहीं से वह मामला शुरू होता है जिसे बाहर से देखने वाला व्यक्ति अक्सर बहुत आसान समझता है।
क्योंकि criminal case में उम्र का यह सवाल सिर्फ एक तारीख का सवाल नहीं है।
अगर वही तारीख किसी व्यक्ति को 17 साल 11 महीने का बनाती है, तो उसकी legal position एक तरफ जा सकती है।
और अगर वही घटना उसे 18 साल 1 महीने का बनाती है, तो पूरी legal framework बदल सकती है।
लेकिन police क्या मौके पर बैठकर खुद final फैसला कर देगी?
नहीं।
कानून ने age को लेकर doubt होने की स्थिति के लिए अलग statutory mechanism रखा है। Section 94, Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 में age determination के लिए documents और उसके बाद, जरूरत पड़ने पर, medical age determination की व्यवस्था दी गई है।
और इससे भी पहले एक practical सवाल है—
अगर police को अभी सिर्फ doubt है, तो उस बच्चे के साथ उसी समय क्या procedure follow होगा?
यहीं से असली कहानी शुरू होती है।
Police के सामने बच्चा कहे “मैं नाबालिग हूँ”, तो पहला कदम क्या होगा?
मान लीजिए किसी offence की investigation में एक व्यक्ति police के सामने आता है और उसकी उम्र 15–18 के बीच होने की संभावना है।
अब police को केवल उसके चेहरे से उम्र तय नहीं करनी है।
और न ही सिर्फ यह कहकर उसे adult मान लेना उचित है कि—
“दिखने में तो 18 का लगता है।”
JJ Act में Section 10 child in conflict with law की apprehension से संबंधित है। ऐसे child को Special Juvenile Police Unit या Child Welfare Police Officer के charge में रखा जाना है और उसे बिना unnecessary delay के, अधिकतम 24 घंटे के भीतर Juvenile Justice Board के सामने produce करना है, journey time को छोड़कर। Act यह भी कहता है कि child को police lock-up या jail में नहीं रखा जाएगा।
लेकिन असली पेच यहीं है—“Child” है कौन?
अब वापस उसी लड़के पर आइए।
वह कह रहा है—
“मैं 17 साल का हूँ।”
Police के पास अभी कोई clear birth certificate नहीं है।
Aadhaar है, लेकिन investigation में उसकी DOB पर doubt पैदा हो गया।
अब police के सामने दो गलत shortcuts हो सकते हैं—
पहला: Aadhaar देखकर बिना कुछ जांचे उम्र final मान लेना।
दूसरा: document पर doubt आते ही कहना—
“ठीक है, इसे adult मानकर normal criminal process चलाओ।”
कानून की statutory scheme इन दोनों shortcuts से ज्यादा सावधानी मांगती है।
अगर child status को लेकर reasonable doubt है, तो age determination का सवाल competent Board के सामने statutory process के अनुसार उठता है। Section 94 में school/matriculation या equivalent certificate और उसके अभाव में local authority/panchayat का birth certificate देखने का क्रम है; इनका अभाव होने पर ही medical age determination की तरफ जाया जाता है।
यानी medical test पहला automatic answer नहीं है।
Aadhaar में DOB कुछ और हो और School Record कुछ और—तो कौन सही?
अब यहीं वह ground-level situation आती है जिसे बहुत से लोग तब तक नहीं समझते जब तक उनके सामने ऐसा मामला न आ जाए।
मान लीजिए—
Aadhaar: 17 वर्ष
School record: 16 वर्ष
Birth certificate: उपलब्ध नहीं
Parents: अलग DOB बता रहे हैं।
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि—
“Aadhaar में क्या लिखा है?”
क्योंकि Section 94 की statutory list में Aadhaar को age determination का पहला prescribed document नहीं रखा गया है।
Courts ने भी ऐसे मामलों में Aadhaar और school records के बीच अंतर को देखकर statutory framework की ओर ध्यान दिलाया है। Punjab & Haryana High Court ने specifically observed किया था कि JJ Act की Section 94 में Aadhaar को prescribed category के रूप में नहीं रखा गया और ordinarily school/matriculation record को primacy दी जाती है, subject to a genuine challenge to its authenticity.
लेकिन इसका दूसरा हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अगर कोई वास्तविक material सामने आता है कि school record ही गलत तरीके से बनाया गया था, DOB बाद में बदली गई थी, या record की authenticity पर गंभीर सवाल है, तो सिर्फ कागज पर तारीख देखकर आँख बंद नहीं की जा सकती।
Supreme Court ने age determination के मामलों में यह distinction महत्वपूर्ण माना है कि prima facie document उपलब्ध होना और बाद में उसकी authenticity/attendant circumstances पर serious question उठना दो अलग situations हैं।
और अब यही वह जगह है जहाँ article का अगला courtroom conflict naturally आएगा—
“अगर document है, लेकिन police कह रही है कि document ही doubtful है, तो क्या होगा?”
यहीं से हमें समझना होगा कि सिर्फ suspicion और legally supported doubt में क्या फर्क है, और उस स्थिति में age determination का अगला कदम कौन उठाता है।
अगर Police को Document पर सचमुच शक है, तो क्या सिर्फ शक से उम्र बदल सकती है?
अब मान लीजिए Police के सामने तीन अलग-अलग बातें हैं।
Aadhaar में एक DOB है।
School record में दूसरी।
और parents तीसरी तारीख बता रहे हैं।
Police को शक होना स्वाभाविक है।
लेकिन सिर्फ शक होना और कानून की नजर में किसी document को गलत साबित कर देना—दो अलग बातें हैं।
यहीं से मामला Police की personal opinion से निकलकर Juvenile Justice Board की statutory process में जाता है।
Section 94(2), JJ Act में Board को reasonable doubt होने पर age determination के लिए एक निर्धारित क्रम दिया गया है। पहले school/matriculation या equivalent certificate देखा जाता है; उसके अभाव में municipal authority/panchayat का birth certificate; और दोनों के अभाव में medical age determination की ओर जाया जाता है।
इसलिए Police के लिए सही approach यह नहीं होगी कि—
“मुझे Aadhaar पर doubt है, इसलिए बच्चा adult है।”
और न यह कि—
“बच्चा 17 बोल रहा है, इसलिए बिना किसी सवाल के 17 मान लिया।”
असल सवाल यह है कि reasonable doubt को competent authority के सामने किस evidence के साथ रखा जाता है।
लेकिन अगर School Record ही गलत निकले तो?
यहीं तुम्हारा parents वाला ground-level scenario बहुत important हो जाता है।
मान लो बच्चे का birth registration समय पर हुआ ही नहीं।
बाद में school admission हुआ।
Admission के समय parents ने उम्र कुछ और बता दी।
School register में वही DOB चली गई।
फिर उसी DOB के आधार पर आगे documents बनते चले गए।
सालों बाद criminal case हुआ।
अब Police कहती है—
“जिस school record को आप age proof बता रहे हैं, उसकी शुरुआत ही parents के declaration से हुई थी।”
यहाँ defence का जवाब भी हो सकता है—
“Record school का है और वर्षों से maintained है।”
अब मामला सिर्फ document दिखाने का नहीं रह गया।
उस document की evidentiary reliability पर वास्तविक विवाद पैदा हो गया।
Supreme Court ने age determination के मामलों में यह distinction स्वीकार किया है कि prescribed documents को केवल किसी अनुमान के आधार पर ignore नहीं किया जा सकता; लेकिन अगर उनकी authenticity या correctness को challenge करने के लिए वास्तविक material मौजूद हो, तो situation अलग हो सकती है।
यानी “document है” और “document conclusively सही है”—इन दोनों के बीच भी कानूनी जगह है।
Medical Age Test कब आता है?
अब उस सवाल पर आते हैं जिसे Police अक्सर सबसे पहले सोच सकती है—
“X-ray करा लेते हैं, उम्र पता चल जाएगी।”
लेकिन JJ Act की scheme इतनी सीधी नहीं है।
Section 94(2)(iii) में medical age determination को तीसरे स्तर पर रखा गया है—जब ऊपर बताए गए prescribed documents उपलब्ध न हों। यह test Board के order पर होता है और Act में इसके लिए 15 दिन की time limit भी दी गई है।
और यहाँ Supreme Court का approach भी बहुत महत्वपूर्ण है।
9 January 2026 के Supreme Court judgment में Court ने age determination के statutory hierarchy को विस्तार से समझाया और बताया कि prescribed documents उपलब्ध होने पर केवल अपनी पसंद के दूसरे evidence के आधार पर उस hierarchy को bypass नहीं किया जा सकता। Court ने यह भी स्पष्ट किया कि medical opinion की भूमिका उस statutory framework के अनुसार आती है।
इसलिए courtroom में अगर कोई कहे—
“Document पर doubt है, सीधा bone test करा दो।”
तो counter होगा—
“पहले यह बताइए कि Section 94 में उपलब्ध evidence का statutory sequence पूरा कैसे हुआ?”
यही छोटा-सा सवाल कई बार पूरे age dispute की दिशा बदल सकता है।
और अब एक और practical complication बचती है।
मान लीजिए बच्चा दूसरे जिले या दूसरे राज्य का है और उसके documents वहाँ हैं। Police के पास तुरंत original school record या birth registration उपलब्ध नहीं है।
ऐसी स्थिति में क्या केवल document तुरंत उपलब्ध न होने के कारण बच्चे को adult मान लिया जाएगा?
यहीं से हमें production before the Board, documents मंगाने की प्रक्रिया और inter-State situation को समझना होगा।


