
मान लीजिए किसी लड़के पर कोई criminal case दर्ज हुआ।
Police record में उसकी उम्र 17 साल लिखी है।
लेकिन दूसरी तरफ कोई कह रहा है—
“नहीं, इसकी उम्र तो 19 साल है।”
अब मामला अचानक सिर्फ उम्र का नहीं रह जाता।
क्योंकि अगर घटना के दिन वह 17 साल का था, तो उसके लिए किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 का पूरा legal framework सामने आ सकता है।
और अगर उसी घटना के दिन वह 18 साल या उससे अधिक था, तो तस्वीर बिल्कुल दूसरी हो सकती है।
इसलिए Courtroom में असली सवाल यह नहीं होता—
“आज उसकी उम्र कितनी है?”
असली सवाल होता है—
“जिस दिन alleged offence हुआ, उस दिन उसकी legally determined age क्या थी?”
अब यहीं से एक और confusion शुरू होता है।
लोग अक्सर मान लेते हैं कि age dispute हुआ तो तुरंत X-ray करा लो और उम्र निकल जाएगी।
कानून इतना simple नहीं है।
धारा 94, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 ने age determination के लिए एक statutory order बनाया है। पहले उपलब्ध documentary evidence देखा जाता है और medical age determination उस स्थिति में आता है जब ऊपर के prescribed records उपलब्ध न हों।
और Supreme Court ने साफ किया है कि medical/ossification test को ऐसा scientific calculator नहीं माना जा सकता जो किसी व्यक्ति की exact जन्मतिथि निकाल दे।
तो अगर कभी Court में यह सवाल खड़ा हो जाए कि—
“यह व्यक्ति उस दिन juvenile था या नहीं?”
तो आगे की पूरी कहानी इसी बात पर निर्भर करेगी कि कानून age तय करने के लिए किस evidence को पहले देखता है, कौन-सा document कमजोर पड़ सकता है और कब medical test की जरूरत आती है।
सबसे पहले यह तय होता है कि उम्र किस तारीख की देखनी है
यह छोटी बात लगती है, लेकिन यहीं से पूरा मामला सही दिशा पकड़ता है।
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 2(13) में “child in conflict with law” की definition उस व्यक्ति से जुड़ी है जिसने offence allegedly commit किया हो और उस offence की तारीख पर 18 वर्ष पूरे न किए हों।
इसका मतलब समझिए।
मान लीजिए—
घटना की तारीख: 10 January 2024
उस दिन accused की उम्र: 17 साल 11 महीने
Case की hearing: 2026
अब 2026 में वह 20 साल का हो चुका है।
तो सिर्फ आज उसकी उम्र 20 साल होने से यह नहीं कहा जा सकता कि घटना के समय वह adult था।
Court को वापस उस relevant date पर जाना होगा।
यही कारण है कि age determination किसी juvenile case में केवल एक formal entry नहीं होती। यह तय कर सकती है कि उस घटना पर कौन-सा legal framework लागू होगा।
और अब अगला सवाल बिल्कुल practical है—
अगर age disputed है, तो Board या Court सबसे पहले कौन-सा document उठाएगी?
यहीं Section 94 की असली व्यवस्था सामने आती है।
उम्र तय करने में सबसे पहले कौन-सा Document देखा जाता है?
अब मान लीजिए Court के सामने उम्र का विवाद है।
एक तरफ accused कह रहा है—
“घटना के दिन मैं 18 साल से कम था।”
दूसरी तरफ prosecution कह रही है—
“नहीं, यह उससे बड़ा था।”
अब Court अपनी तरफ से कोई अनुमान लगाकर उम्र तय नहीं करेगी। धारा 94(2), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 ने evidence को देखने का एक क्रम दिया है।
पहला आधार — School या Matriculation का प्रमाण
अगर बच्चे की school/matriculation या equivalent certificate उपलब्ध है, तो उसे प्राथमिकता दी जाती है।
यानी अगर किसी बच्चे के पास ऐसा विश्वसनीय educational record मौजूद है जिसमें उसकी date of birth दर्ज है, तो केवल इसलिए उसे किनारे करके सीधे medical test पर जाना सही approach नहीं है।
Supreme Court ने January 2026 के एक महत्वपूर्ण judgment में इसी बात को practically लागू किया। वहाँ municipal birth certificate और school certificate दोनों उपलब्ध थे, और दोनों एक ही date of birth को support कर रहे थे। फिर भी medical examination के आधार पर उम्र बदलने की कोशिश की गई।
Supreme Court ने इस approach को गलत माना और कहा कि Section 94(2) में documents को जो statutory priority दी गई है, उसे नजरअंदाज करके medical test पर जाना उचित नहीं था।
यानी courtroom में अगर एक तरफ मजबूत documentary record है और दूसरी तरफ केवल medical estimate, तो दोनों को बराबर वजन देकर नहीं देखा जा सकता।
School Record नहीं है तो अगला रास्ता क्या है?
अब मान लीजिए school या matriculation certificate उपलब्ध ही नहीं है।
तब मामला वहीं खत्म नहीं होता।
धारा 94(2), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अनुसार अगला महत्वपूर्ण documentary evidence जन्म प्रमाण-पत्र हो सकता है—जैसे Corporation, Municipal Authority या Panchayat द्वारा जारी birth certificate।
इसे एक practical situation से समझिए।
मान लीजिए—
- School record उपलब्ध नहीं है;
- लेकिन नगर निकाय का birth certificate मौजूद है;
- उसमें बच्चे की date of birth घटना की तारीख से पहले की है;
- और उस document की authenticity पर कोई गंभीर सवाल नहीं है।
तो केवल “यह document बाद में मिला” या “मुझे इस उम्र पर शक है” कहकर तुरंत X-ray कराने की तरफ जाना statutory sequence को उलट सकता है।
यही वजह है कि age determination में document की quality और उसकी statutory position, दोनों महत्वपूर्ण हैं।
और अब अगर school certificate भी नहीं है और birth certificate भी उपलब्ध नहीं है, तब जाकर अगला दरवाजा खुलता है।
वहीं से medical age determination की जरूरत सामने आ सकती है।
Medical Test कब आता है और X-ray को कितना भरोसेमंद माना जाता है?
अब उस point पर वापस आते हैं जिसे तुमने शुरुआत में उठाया था।
अगर धारा 94(2)(i) और (ii), किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में बताए गए relevant documents उपलब्ध नहीं हैं, तो धारा 94(2)(iii) के तहत ossification test या कोई अन्य latest medical age determination test कराया जा सकता है।
लेकिन यहाँ एक बहुत जरूरी सावधानी है।
X-ray कोई जन्म प्रमाण-पत्र नहीं है।
Medical examination से age का approximate assessment मिल सकता है; exact date of birth नहीं।
Supreme Court ने पहले भी यह बात स्पष्ट की है कि ossification test exact science नहीं है। इसलिए medical opinion को उसके nature और limitations के साथ पढ़ना होगा।
और यही तुम्हारे पहले उठाए हुए point का सही legal version है:
“X-ray में छह महीने की fixed गलती होती है”—ऐसा कोई universal statutory rule नहीं है।
Age estimation में variation हो सकता है, लेकिन Court को medical opinion को mechanically exact age मानकर नहीं चलना चाहिए।
इसलिए अगर medical report कहती है कि age लगभग किसी range में है, तो अगला सवाल यही होगा—
क्या बाकी evidence उस range को support करता है या contradict?
यानी medical report खुद पूरी कहानी नहीं है।
अब article का अगला natural loop यही बनेगा:
अगर documents आपस में अलग-अलग उम्र बता रहे हों तो Court किसे मानेगी?
क्योंकि असली मुश्किल अक्सर तब शुरू होती है जब—
School record कुछ कहता है, birth certificate कुछ और, और medical report तीसरी range।
यहीं से age determination का असली courtroom dispute पैदा होता है।
अगर उम्र बताने वाले Documents आपस में अलग हों तो Court क्या देखेगी?
अब मान लीजिए मामला यहाँ तक पहुँच गया है।
School certificate में एक date of birth है।
Birth certificate में दूसरी।
और medical report किसी तीसरी age range की तरफ इशारा कर रही है।
अब सवाल यह नहीं है कि “तीनों में से जो सबसे कम उम्र दिखा रहा है, वही मान लो।”
कानून ऐसा कोई shortcut नहीं देता।
धारा 94(2), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में documents को जिस क्रम में रखा गया है, Court को उस statutory scheme को ध्यान में रखकर evidence देखना होता है। इसलिए document की authenticity, reliability और statutory priority महत्वपूर्ण हो जाती है।
एक document है, लेकिन उसकी entry कब हुई थी?
अब एक और practical complication समझिए।
मान लीजिए school record में DOB मौजूद है, लेकिन defence को शक है कि admission के समय age या DOB सही नहीं बताई गई थी।
तो केवल certificate हाथ में होना ही हर dispute को खत्म नहीं करता।
Court यह भी देख सकती है कि record कैसे बना, किस material पर बना और उसकी reliability पर कोई वास्तविक सवाल है या नहीं।
यही कारण है कि Supreme Court ने age determination के मामलों में documents की evidentiary value को mechanically नहीं, बल्कि पूरे record के context में देखने पर जोर दिया है।
अगर School Record और Birth Certificate अलग-अलग हों तो?
अब courtroom में सबसे मुश्किल स्थिति यही हो सकती है।
मान लीजिए—
School Certificate: 15 March 2008
Birth Certificate: 20 September 2007
और alleged offence की तारीख ऐसी है जहाँ इन दोनों dates से age threshold पर फर्क पड़ रहा है।
अब किसी lawyer के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा—
“मेरे पास school certificate है।”
दूसरी तरफ prosecution भी केवल यह कहकर नहीं निकल सकती—
“Birth certificate में अलग date है, इसलिए वही final है।”
Court को available documents और उनके source को देखना होगा।
किस authority ने document जारी किया?
Record कब बना?
क्या उसमें कोई alteration है?
क्या दूसरे contemporaneous records उसी date को support करते हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या document genuine और legally reliable है?
यानी age dispute कई बार arithmetic से ज्यादा evidence का सवाल बन जाता है।
और यहीं एक और महत्वपूर्ण Supreme Court principle काम आता है।
क्या बाद में बनाया गया या बदला हुआ Record Juvenility साबित कर सकता है?
यहाँ सावधानी बहुत जरूरी है।
अगर कोई document बाद में बनाया गया दिखाई देता है, या उसके creation के circumstances suspicious हैं, तो केवल उसके ऊपर age का पूरा determination खड़ा करना सुरक्षित approach नहीं होगा।
Supreme Court ने juvenile-age disputes में documentary evidence की reliability और statutory order को गंभीरता से देखा है। खासकर जहाँ contemporaneous records उपलब्ध हों, वहाँ बाद के material को बिना जांचे superior मान लेना उचित नहीं है।
इसे एक practical courtroom scene में रखिए।
एक पुराना school record मौजूद है।
बाद में एक नया document सामने आता है जिसमें DOB अलग है।
अब defence कहती है—
“यह document मेरी age कम दिखाता है, इसलिए मुझे juvenile माना जाए।”
लेकिन Court का अगला सवाल हो सकता है—
“यह document कब बना? किस आधार पर बना? क्या इसका कोई पुराना supporting record है?”
यहीं से document की credibility सामने आती है।
इसलिए age determination में सिर्फ document का नाम नहीं, उसकी उत्पत्ति और विश्वसनीयता भी matter कर सकती है।
और अगर Documents से भी बात साफ न हो तो?
अब हम उस स्थिति पर पहुँचते हैं जहाँ documentary evidence उपलब्ध नहीं है, contradictory है, या उससे relevant age conclusively establish नहीं हो पा रही।
यहीं धारा 94(2)(iii), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत medical age determination का रास्ता आता है। इसमें ossification test या कोई अन्य latest medical age determination test कराया जा सकता है।
लेकिन यहाँ फिर वही गलती नहीं करनी है—
Medical report = exact date of birth
नहीं।
Medical opinion का काम approximate age का assessment देना है।
इसलिए अगर report कहती है कि व्यक्ति की उम्र किसी range में हो सकती है, तो Court उस opinion को उसके scientific limitations के साथ देखेगी।
और अगर उस range का एक हिस्सा juvenile threshold के नीचे आता है और दूसरा हिस्सा ऊपर, तो मामला और sensitive हो जाता है।
यहीं Court को पूरे available evidence को साथ रखकर देखना पड़ सकता है।
इसका मतलब यह हुआ कि age determination का आखिरी सहारा medical test हो सकता है, लेकिन medical test खुद हर dispute का automatic final answer नहीं है।
अब अगला सवाल और भी महत्वपूर्ण है—
अगर medical report में age की range आती है और उसी range में 18 वर्ष की सीमा पड़ रही है, तो Court benefit किस तरह देखती है?
यहीं age determination का सबसे sensitive courtroom situation सामने आता है।
जब Medical Report में भी Exact Age न मिले, तो 18 साल की सीमा कैसे देखी जाती है?
अब हम उसी point पर हैं जहाँ documentary evidence ने पूरी बात साफ नहीं की और medical opinion ने भी कोई exact जन्मतिथि नहीं दी।
मान लीजिए medical report किसी age range की तरफ इशारा करती है।
उस range का एक हिस्सा 18 वर्ष से कम है और दूसरा हिस्सा 18 वर्ष से अधिक।
अब सवाल यह नहीं हो सकता कि report देखकर बस एक number चुन लिया जाए।
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में “child in conflict with law” की पहचान उस व्यक्ति की उम्र से जुड़ी है जिसने alleged offence की तारीख पर 18 वर्ष पूरे नहीं किए थे।
इसलिए age determination में 18 साल की statutory boundary को बहुत सावधानी से देखना पड़ता है।
Medical opinion को exact birthday मान लेना गलती होगी
मान लीजिए report कहती है कि व्यक्ति की उम्र लगभग एक ऐसी range में है जिसमें 17 और 18 दोनों possibilities आती हैं।
तो report से यह कहना कि—
“ठीक 18 साल है।”
या—
“ठीक 17 साल है।”
सिर्फ report के आधार पर हमेशा उचित नहीं होगा।
Medical age estimation की अपनी scientific limitations हैं। इसलिए Court को उपलब्ध documentary evidence, medical opinion और पूरे record को साथ देखकर निष्कर्ष तक पहुँचना पड़ सकता है।
यही वजह है कि age determination में medical report अंतिम सत्य नहीं, evidence का एक हिस्सा हो सकती है।
अगर उम्र का विवाद बहुत देर से उठे तो क्या Juvenility का सवाल खत्म हो जाता है?
अब एक और practical situation सोचिए।
Case काफी आगे बढ़ चुका है।
Evidence चल रहा है।
फिर accused कहता है—
“घटना के दिन मैं 18 साल से कम था।”
क्या सिर्फ इसलिए कि यह बात शुरुआत में नहीं उठाई गई, अब Court इसे सुनने से मना कर सकती है?
यहाँ कानून का approach काफी महत्वपूर्ण है।
धारा 9(2) और धारा 9(3), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 Court को यह power देती हैं कि यदि किसी proceeding के दौरान यह प्रश्न उठता है कि व्यक्ति offence की तारीख पर child था या नहीं, तो Court उस question की inquiry कर सकती है और जरूरत पड़ने पर age determination के लिए Act की व्यवस्था का सहारा ले सकती है।
इसका मतलब यह है कि juvenility का सवाल केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि वह पहले नहीं उठाया गया था।
लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि कोई व्यक्ति केवल बाद में claim कर दे और Court बिना evidence के उसे juvenile मान ले।
Claim के बाद age का legal determination जरूरी रहेगा।
यानी यहाँ फिर वही basic principle लौटता है—
दावा अलग चीज है, साबित हुई age अलग।
Court में Age साबित करने वाला व्यक्ति क्या-क्या सामने रख सकता है?
अब practical level पर सोचिए।
अगर किसी परिवार को पता है कि बच्चे की age case की direction बदल सकती है, तो केवल एक document लेकर Court पहुँच जाना पर्याप्त नहीं हो सकता।
पूरे age-related record को एक साथ देखना ज्यादा सुरक्षित approach हो सकता है—
Birth record
School/Matriculation record
Admission-related material
अन्य contemporaneous documents
और जहाँ statutory conditions में जरूरी हो, medical age assessment।
क्योंकि कभी एक document अकेला दिखता है कि बच्चा 17 साल का था, लेकिन दूसरे पुराने records उसके विपरीत picture दे सकते हैं।
और कभी इसका उल्टा भी हो सकता है।
इसलिए age dispute में असली strength केवल “मेरे पास certificate है” कहने में नहीं है।
असली सवाल है—
“क्या इस certificate और बाकी record से घटना की तारीख पर उम्र reliably establish होती है?”
यही वह point है जहाँ age determination एक simple paperwork issue से निकलकर वास्तविक evidence question बन जाता है।
अगर Court ने गलत तरीके से Age तय कर दी तो?
अब मान लीजिए available record के बावजूद age determination गलत तरीके से हुई।
इसका असर केवल birth date की एक entry पर नहीं पड़ सकता।
अगर व्यक्ति को कानून की नजर में child माना जाना चाहिए था, लेकिन उसे adult मान लिया गया, तो उसके ऊपर लागू होने वाली पूरी juvenile-justice process प्रभावित हो सकती है।
और उलटी स्थिति में भी यही बात लागू होगी।
इसीलिए age determination को शुरुआत में ही गंभीरता से लेना जरूरी है।
क्योंकि age यहाँ केवल एक number नहीं है।
यह तय कर सकती है कि उस alleged offence पर कौन-सा statutory framework लागू होगा।
और इसी कारण Supreme Court ने age determination के मामलों में statutory documents और उनके evidentiary value को बहुत सावधानी से देखने की जरूरत बताई है।
Age तय करने में सबसे बड़ी गलती कहाँ हो सकती है?
अब तक की बात से एक चीज़ साफ है—Juvenile की उम्र तय करना केवल “कौन-सा certificate दिखा दिया” वाला काम नहीं है।
अगर किसी document की genuineness ही doubtful है, तो उसे आँख बंद करके स्वीकार करना भी सही नहीं होगा।
2025 में Allahabad High Court के एक मामले में यही सवाल सामने आया। Court ने देखा कि school-related records पर भरोसा करने से पहले उनकी authenticity और source को properly examine करना जरूरी है। Court ने यह भी दोहराया कि धारा 94(2), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में evidence की statutory priority को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यानी courtroom में दोनों तरफ की गलती संभव है।
एक तरफ—
“Medical report है, इसलिए school record छोड़ दो।”
और दूसरी तरफ—
“School paper है, इसलिए बिना जांचे इसे final मान लो।”
दोनों approaches जरूरत से ज्यादा mechanical हो सकती हैं।
Original record और उसकी reliability क्यों मायने रखती है?
मान लीजिए किसी बच्चे की उम्र साबित करने के लिए केवल एक photocopy सामने रख दी गई।
अब सवाल होगा—
Original कहाँ है?
Entry कब हुई थी?
किस आधार पर DOB दर्ज की गई थी?
क्या issuing authority उस record को verify कर सकती है?
यही बात 2025 के Allahabad High Court के एक decision में विशेष रूप से सामने आई, जहाँ Court ने केवल photocopies और unproved school records के आधार पर age determination को पर्याप्त नहीं माना और Section 94 की प्रक्रिया के पालन पर जोर दिया।
इससे एक practical lesson निकलता है:
Age का document होना और age का legally reliable proof होना हमेशा एक ही बात नहीं है।
अगर Board को पहली नजर में ही बच्चा दिखाई दे तो क्या फिर भी पूरी Medical प्रक्रिया जरूरी है?
जरूरी नहीं।
यहाँ धारा 94(1), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को भी समझना जरूरी है।
अगर Committee या Board को व्यक्ति की appearance के आधार पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि वह child है, तो Board/Committee उस observation को record करके inquiry आगे बढ़ा सकती है; हर मामले में पहले medical confirmation का इंतजार करना जरूरी नहीं है।
यानी कानून ने यह भी नहीं कहा कि—
“हर juvenile को पहले hospital भेजो, फिर कानून शुरू होगा।”
अगर उम्र को लेकर reasonable doubt ही नहीं है, तो statutory process अलग तरह से आगे बढ़ सकता है।
Medical age determination तब relevant होता है जब reasonable doubt हो और Section 94(2) में पहले रखे गए documentary options उपलब्ध न हों।
यह छोटा सा फर्क practical cases में काफी बड़ा हो सकता है।
Age तय होने के बाद ही Juvenile होने का कानूनी सवाल क्यों महत्वपूर्ण हो जाता है?
अब पूरे article को उसके मूल सवाल पर वापस लाते हैं।
“नाबालिग होने का फैसला किस आधार पर होता है?”
जवाब केवल यह नहीं है कि बच्चे ने क्या बताया।
और न ही केवल यह कि medical report में क्या अनुमान आया।
कानून एक structured process देता है:
Relevant date of offence
→ Section 94 के तहत age determination
→ पहले prescribed documentary evidence
→ उसकी reliability की जांच
→ documents उपलब्ध न होने पर medical age determination
→ पूरे record के आधार पर legal conclusion
और एक महत्वपूर्ण बात फिर याद रखिए—
आज व्यक्ति 18 या 20 साल का हो गया, इससे घटना के दिन की उसकी age नहीं बदलती।
किशोर न्याय व्यवस्था में relevant question वही रहता है कि alleged offence की तारीख पर वह 18 वर्ष से कम था या नहीं।
यही कारण है कि age determination को case की शुरुआत में हल्के में लेना बाद में गंभीर procedural dispute पैदा कर सकता है।
और अगर age determination ही गलत आधार पर हुई हो, तो आगे की juvenile proceedings की jurisdiction तक सवाल में आ सकती है—जैसा कि 2025 के Allahabad High Court के एक मामले में देखा गया, जहाँ proper age determination के अभाव को jurisdictional issue माना गया।


