
मान लीजिए रात में पुलिस किसी 17 साल के बच्चे को एक आपराधिक मामले में पकड़कर कानून की प्रक्रिया में ले आती है।
घरवालों को जैसे ही पता चलता है, पहला सवाल यही आता है—
“अब क्या होगा? इसे जेल भेजेंगे या जमानत मिल सकती है?”
और यहीं एक बहुत आम गलती होती है।
लोग तुरंत सामान्य criminal case वाली bail की तस्वीर दिमाग में ले आते हैं—अपराध कितना गंभीर है, कितनी सजा हो सकती है, आरोप कितना बड़ा है।
लेकिन अगर सामने वाला व्यक्ति कानून की नजर में child है और मामला किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत आता है, तो जमानत का सवाल उसी Act की अपनी statutory व्यवस्था के अनुसार देखना होगा।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण provision है—
धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015।
और इसकी खास बात यह है कि कानून ने शुरुआत ही इस सोच से की है कि बच्चे को bail पर release करना सामान्य नियम है, जबकि release रोकना कुछ निर्धारित परिस्थितियों से जुड़ा है।
लेकिन अब असली सवाल यह है—
क्या इसका मतलब यह है कि नाबालिग ने कोई भी अपराध किया हो, उसे हर हालत में bail मिल जाएगी?
नहीं।
कानून ने यहीं तीन महत्वपूर्ण दरवाज़े भी बनाए हैं।
और असली courtroom कहानी इन्हीं दरवाज़ों के बीच शुरू होती है।
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Toggleधारा 12, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में Bail का मूल नियम क्या है?
अब पिछली बात से सीधे आगे आइए।
अगर यह मान लिया गया कि सामने वाला व्यक्ति apparently a child है और उस पर किसी अपराध का आरोप है, तो अगला सवाल है—जमानत के लिए कानून ने क्या व्यवस्था बनाई है?
यहाँ हमें सीधे धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 को पढ़ना होगा। इस धारा में कहा गया है कि ऐसा बच्चा, चाहे आरोपित अपराध bailable हो या non-bailable, सामान्यतः bail पर release किया जाएगा—बिना surety, surety के साथ, या probation officer/fit person की supervision या care में।
अब जरा इसको सामान्य criminal case की सोच से अलग करके देखिए।
लोग अक्सर पूछते हैं—
“अपराध non-bailable है, तो juvenile को bail कैसे मिल सकती है?”
यही तो इस provision की खास बात है।
धारा 12, JJ Act, 2015 ने child के लिए bail का अपना statutory rule बनाया है। इसलिए केवल यह कह देना कि “offence non-bailable है”, अपने-आप juvenile bail का दरवाजा बंद नहीं करता।
लेकिन Parliament ने दूसरी तरफ तीन स्थितियाँ भी साफ रखी हैं।
अगर release से reasonable ground पर यह दिखाई दे कि बच्चा—
- किसी known criminal के association में जा सकता है;
- moral, physical या psychological danger में पड़ सकता है; या
- उसकी release से ends of justice defeat हो सकते हैं,
तो bail रोकी जा सकती है।
और एक महत्वपूर्ण बात—bail deny करने पर Board को reasons record करने होते हैं।
यहीं courtroom में असली सवाल पैदा होता है।
सिर्फ अपराध गंभीर है—क्या इतना कहना काफी है?
मान लीजिए आरोप बहुत गंभीर है।
Prosecution कहती है—
“अपराध की nature देखिए, आरोप बहुत गंभीर है, बच्चे को बाहर नहीं भेजना चाहिए।”
अब Board के सामने असली काम केवल offence का नाम पढ़ना नहीं है।
धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में जो specific grounds दिए गए हैं, उन्हें उस particular child और available material के साथ जोड़कर देखना होगा।
यानी—
“अपराध गंभीर है”
और
“बच्चे की release से Section 12 की statutory conditions में से कोई condition वास्तव में बनती है”
इन दोनों को एक ही बात मान लेना सही नहीं होगा।
Supreme Court के सामने भी Section 12 की यही statutory structure आई है और Court ने provision को उसके अपने framework में पढ़ा है।
Bail रोकने के तीन कारणों को Courtroom में कैसे समझें?
अब इन तीन grounds को सिर्फ कानूनी शब्दों में पढ़कर आगे मत निकल जाइए। असली फर्क यहीं समझना है।
1. Known criminal के साथ association का खतरा
मान लीजिए 17 साल का बच्चा पहली बार किसी मामले में फँसा है। बाहर आने के बाद वह ऐसे लोगों के संपर्क में जा सकता है जिनका criminal background है और जिनसे उसके दोबारा उसी तरह की गतिविधियों में जाने का वास्तविक खतरा पैदा हो सकता है।
यहाँ सवाल केवल यह नहीं है कि—
“उसने क्या किया था?”
सवाल यह भी है—
“Release के बाद वह किस environment में जाएगा?”
यानी bail के समय बच्चे के surroundings भी कानूनी महत्व ले सकते हैं।
2. बच्चे के लिए moral, physical या psychological danger
अब दूसरा scenario बिल्कुल उल्टा हो सकता है।
मान लीजिए बच्चा ऐसे environment में वापस जाएगा जहाँ उसे खुद harm होने का खतरा है।
तो यहाँ bail रोकने का सवाल punishment देने के लिए नहीं, बल्कि child की safety के angle से भी जुड़ सकता है।
यही JJ Act की child-centric सोच को दिखाता है।
कानून केवल यह नहीं देख रहा कि—
“बच्चे ने बाहर जाकर क्या किया?”
वह यह भी पूछ सकता है—
“बाहर जाने के बाद बच्चे के साथ क्या हो सकता है?”
3. Release से ends of justice defeat होने की स्थिति
यह सबसे broad और सबसे सावधानी से पढ़े जाने वाला ground है।
सिर्फ शब्द पढ़कर यह मान लेना कि “ends of justice” मतलब कोई भी गंभीर allegation—इतना सीधा formula नहीं बनाया जा सकता।
Board को अपने सामने मौजूद facts और circumstances के आधार पर reasoned decision लेना होगा।
और यही कारण है कि bail reject करने का order सिर्फ एक line का निष्कर्ष नहीं होना चाहिए—Section 12 खुद reasons record करने की बात करता है।
अगर Bail मिल गई लेकिन उसकी Conditions पूरी नहीं हो पा रहीं तो?
यह एक practical situation है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
मान लीजिए Board ने bail दे दी।
लेकिन बच्चा या उसका guardian bail order की conditions को पूरा नहीं कर पा रहा।
अब क्या?
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 12(4) इस स्थिति को भी address करती है। अगर child bail order की conditions को सात दिनों के भीतर पूरा नहीं कर पाता, तो उसे Board के सामने produce किया जाना है ताकि bail conditions में modification पर विचार किया जा सके।
यानी—
Bail granted = कहानी खत्म
ऐसा जरूरी नहीं।
कभी समस्या bail देने में नहीं, उस bail की condition practically पूरी करने में हो सकती है।
और कानून ने इस practical difficulty के लिए भी रास्ता रखा है।
यही वह जगह है जहाँ JJ Act की bail व्यवस्था को सामान्य “bail मिली या नहीं मिली” वाली दो लाइन की कहानी से समझना अधूरा होगा।
अगर Police Station से ही Bail का सवाल उठे तो?
अब एक और practical point।
हर मामला सीधे Board के सामने जाकर ही शुरू नहीं होता।
धारा 12(1), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 police apprehension के बाद भी bail की व्यवस्था को recognize करती है। यदि police station का officer child को bail पर release नहीं करता, तो धारा 12(2) के अनुसार उसे केवल observation home या, परिस्थितियों के अनुसार, place of safety में prescribed manner में रखा जाना है, जब तक उसे Board के सामने लाया जा सके।
इसका मतलब यह नहीं कि police के पास unlimited discretion है कि बच्चा जहाँ चाहे वहाँ रखा जाए।
JJ Act ने आगे की custody के लिए भी child-specific framework बनाया है।
और यहीं से एक natural अगला सवाल पैदा होता है—
अगर police ने bail नहीं दी, तो Board के सामने बच्चे के आने के बाद क्या होता है?
यही अगले हिस्से में हमारे लिए महत्वपूर्ण होगा—क्योंकि वहाँ bail application सिर्फ एक कागज नहीं रहती; Board को यह देखना होता है कि Section 12 के statutory grounds वास्तव में मौजूद हैं या नहीं।
Juvenile की Bail पर Board को क्या देखना पड़ता है?
अब मान लीजिए बच्चा Board के सामने है और bail का सवाल सामने रख दिया गया है।
यहाँ केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि FIR में कौन-सी धाराएँ लगी हैं।
धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की अपनी कसौटी है। इसलिए Board को यह देखना होगा कि बच्चे की release रोकने के लिए उस धारा में बताए गए grounds वास्तव में बनते हैं या नहीं।
यहीं एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण फर्क समझिए।
अगर prosecution कहती है—
“अपराध बहुत गंभीर है, इसलिए bail नहीं मिलनी चाहिए।”
तो अगला सवाल होगा—
“ठीक है, लेकिन धारा 12 में दिया गया कौन-सा statutory ground इस बच्चे की release के खिलाफ बन रहा है?”
क्या बाहर जाने के बाद उसका किसी known criminal से association होने का reasonable ground है?
क्या उसके बाहर जाने से उसके moral, physical या psychological danger में पड़ने की आशंका है?
या available circumstances में उसकी release से ends of justice defeat होने की बात बनती है?
और यदि bail deny की जाती है, तो धारा 12(2), किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत उसके लिए reasons का महत्व है। कानून का यह ढाँचा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चे को केवल आरोप की seriousness के आधार पर adult bail principles के उसी साँचे में रख देना सही approach नहीं होगा।
Supreme Court ने Juvenile Bail को लेकर क्या दृष्टिकोण अपनाया है?
अब यहाँ एक वास्तविक judicial layer जोड़ना जरूरी है।
Supreme Court ने Ranjeet Kumar Ram v. State of Bihar में Juvenile Justice Act की Section 12 के संदर्भ में bail के statutory framework पर विचार किया। Court ने यह स्पष्ट किया कि juvenile के bail matter में Act की विशेष व्यवस्था को ध्यान में रखना होगा और केवल सामान्य criminal-law assumptions से मामला तय नहीं किया जा सकता।
इसी तरह बाद के मामलों में Supreme Court ने यह भी दोहराया है कि Section 12 के तहत bail पर विचार करते समय उसके statutory exceptions को वास्तविक material से जोड़कर देखना आवश्यक है।
अब इसे courtroom में रखिए।
अगर Board के सामने केवल इतना material है—
“अपराध गंभीर है।”
तो वह एक fact हो सकता है।
लेकिन Section 12 का सवाल इससे आगे है—
“क्या release के खिलाफ Section 12 में बताए गए कारणों में से कोई कारण इस particular child के मामले में स्थापित होता है?”
यही reasoning bail order को मजबूत या कमजोर बना सकती है।
और यहीं reasoned order की importance आती है।
अगर bail reject की जा रही है, तो order में यह समझ आना चाहिए कि Board ने किस statutory ground को माना और उसके लिए क्या material सामने था।
अगर Juvenile की उम्र ही विवादित हो तो Bail का सवाल कैसे बदलेगा?
अब एक ऐसा situation मानिए जो वास्तविक मामलों में काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।
एक तरफ accused कह रहा है—
“घटना के समय मैं 18 साल से कम था।”
दूसरी तरफ prosecution उसकी उम्र को लेकर dispute कर रही है।
अब bail का सवाल अकेले नहीं खड़ा है।
पहले यह भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि कानून उस व्यक्ति को उस relevant time पर child मानता है या नहीं।
यहाँ धारा 94, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 का age determination framework सामने आ सकता है। कानून में documents को प्राथमिकता दी गई है और medical age determination को prescribed circumstances में बाद के स्तर पर रखा गया है।
और जैसा हमने ऊपर देखा, medical opinion कोई ऐसा calculator नहीं है जो जन्म की exact तारीख निकाल दे।
Supreme Court ने बार-बार माना है कि ossification test approximate age का संकेत देता है, exact age नहीं। इसलिए केवल X-ray या ossification report को mechanically अंतिम सत्य मानना सही नहीं है।
लेकिन यहाँ भी एक सीमा रखनी होगी।
Age determination पूरा article नहीं है।
Bail के सवाल पर उसका उतना ही हिस्सा relevant है जितना यह समझने के लिए जरूरी है कि Section 12 का statutory benefit किस व्यक्ति के मामले में उठ रहा है।
बाकी पूरा age-proof dispute अपने अलग legal question के रूप में देखा जाएगा।
गंभीर अपराध में Juvenile Bail का सवाल क्या अलग हो जाता है?
अब उस सवाल पर आते हैं जो लगभग हर परिवार सबसे पहले पूछता है—
“अगर आरोप बहुत गंभीर है तो?”
यहीं अक्सर दो extreme answers मिलते हैं।
एक—
“Juvenile है, इसलिए bail पक्की है।”
दूसरा—
“अपराध serious है, इसलिए bail नहीं मिलेगी।”
दोनों statements बहुत absolute हैं।
धारा 12, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 को पढ़ने पर पता चलता है कि bail का statutory starting point child की release है, लेकिन Section 12 के proviso में specific circumstances हैं जिनमें release रोकी जा सकती है। इसलिए गंभीर allegation को ignore भी नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे अपने-आप statutory exception मान लेना भी सही नहीं होगा।
और यही distinction हमारे पूरे सवाल का केंद्र है।
अपराध की seriousness एक fact है।
Bail रोकने का statutory ground एक legal conclusion है।
इन दोनों के बीच reasoning चाहिए।
यही reasoning Board के सामने matter करती है।
Juvenile Bail के मामले में आखिर कौन-सी बात निर्णायक बनती है?
अब इस पूरे सवाल को एक वास्तविक स्थिति में रखकर देखिए।
एक बच्चा है। उस पर आरोप लगा है। परिवार परेशान है और सबसे पहले यही जानना चाहता है—
“बच्चा कब बाहर आएगा?”
लेकिन Court या Juvenile Justice Board के सामने सवाल केवल इतना नहीं होता कि परिवार उसे बाहर चाहता है या नहीं।
सवाल यह होता है कि कानून के अनुसार release रोकने का कोई ऐसा आधार मौजूद है या नहीं, जिसे record और परिस्थितियाँ support करती हों।
यहीं धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की पूरी practical importance सामने आती है।
अगर ऐसे grounds मौजूद नहीं हैं, तो केवल आरोप की गंभीरता को देखकर juvenile bail को सामान्य adult criminal case की तरह देखना सही नहीं होगा।
और अगर release रोकने का statutory ground वास्तव में मौजूद है, तो Board उस material को नजरअंदाज भी नहीं कर सकता।
इसलिए किसी juvenile bail matter में सबसे मजबूत सवाल अक्सर यह होता है—
“कानून में bail रोकने का जो आधार बताया गया है, वह इस particular बच्चे के मामले में वास्तव में कहाँ दिखाई देता है?”
यही सवाल आरोप और कानूनी निष्कर्ष के बीच की दूरी तय करता है।
Juvenile Bail को लेकर सबसे जरूरी बात
अगर इस पूरे article को एक साफ तस्वीर में समेटें, तो बात यह है—
नाबालिग के मामले में bail का सवाल केवल offence की धारा देखकर तय नहीं होता।
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 12 अपना विशेष framework देती है।
बच्चे की release सामान्य starting point है।
Release रोकने के लिए कानून ने specific circumstances रखी हैं।
और यदि release रोकी जाती है, तो उस decision को reasons और available material के साथ समझना होगा।
अगर उम्र को लेकर genuine dispute हो, तो धारा 94, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत age determination का सवाल सामने आ सकता है। Medical opinion की अपनी evidentiary limitations हैं; उसे जन्म की exact तारीख बताने वाली मशीन मानना सही नहीं होगा।
और अगर bail मिल चुकी है लेकिन उसकी conditions practically पूरी नहीं हो पा रही हैं, तो धारा 12(4) उस स्थिति को भी address करती है।
यानी कानून ने केवल यह नहीं सोचा कि—
“बेल दो या मत दो।”
उसने उस decision के आसपास पैदा होने वाली practical situations के लिए भी व्यवस्था बनाई है।
निष्कर्ष
Juvenile bail को समझने के लिए सबसे पहले यह भूलना होगा कि हर criminal case में इस्तेमाल होने वाली सामान्य bail की सोच को उसी रूप में यहाँ लगा दिया जाए।
यहाँ अपना विशेष कानून है।
धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 बच्चे की bail को एक अलग statutory framework में रखती है।
इसलिए अगर किसी नाबालिग पर गंभीर अपराध का आरोप है, तो केवल FIR में लगी धाराओं को देखकर अंतिम निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं होगा।
देखना होगा—
क्या बच्चा वास्तव में JJ Act के framework में आता है?
क्या release रोकने के लिए Section 12 में बताए गए circumstances मौजूद हैं?
क्या उन circumstances को record support करता है?
और यदि bail deny हुई है, तो क्या उसके पीछे स्पष्ट reasons हैं?
यही वे सवाल हैं जिनसे juvenile bail का वास्तविक कानूनी परीक्षण शुरू होता है।
और शायद परिवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है—
“बच्चे पर आरोप क्या है?” महत्वपूर्ण है, लेकिन juvenile bail में अगला सवाल उतना ही महत्वपूर्ण है—“उसे बाहर रखने से Section 12 में बताई गई कौन-सी कानूनी समस्या वास्तव में पैदा होगी?”
इसी अंतर को समझना जरूरी है।
क्योंकि Juvenile Justice Act में बच्चे की liberty और उसकी protection—दोनों को साथ देखकर कानून अपना संतुलन बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल –
1. क्या Juvenile को Bail मिलना सामान्य नियम है?
हाँ, धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में बच्चे को bail पर release करने की statutory व्यवस्था है। लेकिन यह absolute right नहीं है। उसी धारा में वे परिस्थितियाँ भी दी गई हैं जिनमें bail रोकी जा सकती है।
2. क्या Non-Bailable Offence में भी Juvenile को Bail मिल सकती है?
हाँ। धारा 12(1), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 bailable और non-bailable दोनों offences के संबंध में juvenile bail का framework देती है। केवल offence के non-bailable होने से juvenile bail का सवाल खत्म नहीं हो जाता।
3. क्या सिर्फ अपराध गंभीर होने के कारण Juvenile की Bail खारिज की जा सकती है?
सिर्फ seriousness को अपने-आप Section 12 के तीन statutory grounds में से एक मान लेना सही नहीं है। Allahabad High Court, Lucknow Bench ने 2024 में ऐसे मामले में bail rejection को set aside किया जहाँ नीचे की अदालतों ने offence की gravity पर भरोसा किया था, लेकिन Section 12 के तीन exceptions में से कोई आधार record से स्थापित नहीं हुआ था।
4. Juvenile की Bail किन परिस्थितियों में रोकी जा सकती है?
धारा 12(1), JJ Act, 2015 के अनुसार release रोकने के लिए reasonable grounds से यह सामने आना चाहिए कि release से बच्चा किसी known criminal के association में जा सकता है, उसे moral, physical या psychological danger हो सकता है, या उसकी release से ends of justice defeat हो सकते हैं।
5. क्या Bail Reject करते समय Juvenile Justice Board को कारण बताना होता है?
हाँ। धारा 12, JJ Act, 2015 में bail deny करने के reasons record करने की आवश्यकता है। इसलिए केवल निष्कर्ष लिख देना और statutory ground को facts से जोड़कर न बताना चुनौती का विषय बन सकता है।
6. अगर Juvenile की उम्र पर विवाद हो तो क्या Bail प्रभावित हो सकती है?
हाँ, क्योंकि पहले यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकता है कि संबंधित व्यक्ति घटना के समय JJ Act के तहत child था या नहीं। उम्र निर्धारण के लिए धारा 94, किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की statutory व्यवस्था लागू होती है। Medical opinion को भी exact date of birth की तरह नहीं पढ़ा जाता।
7. क्या Juvenile को Bail मिलने के बाद भी कोई Conditions लग सकती हैं?
हाँ। Bail के साथ guardian, supervision या अन्य conditions हो सकती हैं। धारा 12(4), JJ Act, 2015 उस स्थिति को भी address करती है जहाँ child सात दिनों के भीतर bail की conditions पूरी नहीं कर पाता।
8. क्या Lucknow Bench ने Juvenile Bail में Section 12 को लागू किया है?
हाँ। Juvenile X v. State of U.P., निर्णय 18 December 2024, में Lucknow Bench ने Section 12 की statutory scheme पर विचार करते हुए पाया कि तीन exceptions में से कोई आधार record पर स्थापित नहीं था और bail स्वीकार की गई।
9. क्या गंभीर आरोप वाले Juvenile को भी Lucknow Bench से Bail मिली है?
हाँ, ऐसे मामलों के उदाहरण हैं। 22 May 2025 के एक Lucknow Bench decision में Court ने कहा कि केवल offence की gravity Section 12 में bail rejection का अलग ground नहीं है और record पर statutory grounds न मिलने पर bail दी।
10. क्या Juvenile Bail के लिए Court केवल FIR में लगी धाराएँ देखती है?
नहीं। आरोप महत्वपूर्ण है, लेकिन धारा 12, JJ Act, 2015 के तहत यह भी देखना होता है कि release रोकने वाले statutory grounds वास्तव में मौजूद हैं या नहीं। परिस्थितियाँ, उपलब्ध material और संबंधित reports भी मामले के निर्णय में महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
Juvenile Bail से जुड़े मामलों में Advocate Manoj Sharma, Lucknow से कानूनी सहायता
Juvenile bail का मामला केवल “अपराध की धारा कौन-सी है?” पूछकर खत्म नहीं होता। कई बार असली कानूनी सवाल यह होता है कि धारा 12, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में bail रोकने के लिए बताए गए आधार उस particular case में वास्तव में मौजूद हैं या नहीं।
Lucknow में Juvenile Justice Board के orders के खिलाफ Allahabad High Court, Lucknow Bench के सामने criminal revision जैसे proceedings भी सामने आती हैं। ऐसे मामलों में Court केवल आरोप की seriousness नहीं, बल्कि लागू statutory framework, Board/नीचे की अदालत के reasoning और record पर मौजूद material को भी देख सकती है।
उदाहरण के लिए, 18 December 2024 के एक Lucknow Bench matter में Juvenile Justice Board, Lucknow और appellate court द्वारा bail rejection को Court ने देखा और पाया कि Section 12 के तीन exceptions में से कोई पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं था; इसके बाद bail application allow की गई।
इसी तरह 22 May 2025 के एक अन्य Lucknow Bench matter में Court ने यह महत्वपूर्ण बात दोहराई कि Section 12 में offence की gravity अपने-आप bail rejection का स्वतंत्र ground नहीं है। Record पर statutory grounds न मिलने के कारण नीचे के orders set aside किए गए और juvenile को bail दी गई।
और एक महत्वपूर्ण practical example 24 September 2025 के Lucknow Bench judgment में मिलता है, जहाँ serious allegations वाले juvenile के मामले में Court ने Section 12 के उद्देश्य, उपलब्ध material और incarceration period को देखते हुए bail दी तथा guardian और probation-related conditions भी लगाईं।
इसलिए यदि किसी juvenile की bail Juvenile Justice Board या appellate court से reject हुई है, तो केवल “बेल नहीं मिली” जानना पर्याप्त नहीं है। संबंधित order में यह देखना जरूरी हो सकता है कि धारा 12 के statutory grounds को facts और record के साथ कैसे जोड़ा गया है।
Advocate Manoj Sharma, Lucknow द्वारा Juvenile Justice Act और criminal matters से जुड़े मामलों में उपलब्ध records, orders और facts के आधार पर legal position समझने तथा उचित remedy पर कानूनी सलाह ली जा सकती है।
हर juvenile case के facts अलग होते हैं। इसलिए किसी दूसरे मामले में मिली bail को अपने मामले में automatic result मानना उचित नहीं होगा।
Legal Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। Juvenile bail का परिणाम संबंधित बच्चे की उम्र, आरोप, उपलब्ध records, Juvenile Justice Board के आदेश, applicable provisions और मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किसी वास्तविक मामले में इस सामग्री को व्यक्तिगत कानूनी सलाह का विकल्प न मानें और संबंधित documents की समीक्षा योग्य अधिवक्ता से कराएँ।


